Tuesday, January 10, 2017

नए दोस्त


तुम्हें पता है शहर के चिल्ल पों से दूर

मैने खोजी है इक जगह 

जहाँ चहचहाती हैं हजारों चिड़ियाँ एक साथ

पेड़ों और झुरमुटों की ओट में छुपकर 

गाती हैं कलरव गीत

चलो आज चुपचापबैठते हैं उस पेंड़ के तले

सुनेंगे वह धुन जो है संगीत से परे


तुमने देखी है बगुलों की कतार

लाल और सफेद बगुलों की कतार

गोधूलि में विषयांतर करते हुए

चलो आज शाम बैठते हैं उस पहाड़ी मंदिर की मुंडेर पर

 अनाम देवता के खण्डहर मंदिर से

 क्षितिज से उठकर क्षितिज में गुम होते

देखेंगे बगुलों की कतार घंटो तक


चलो तुम्हें मिलवाता हूँ

उन दूर देश से आए मेहमानों से

जंगल के उस तालाब किनारे

डाले हैं आशियाना वे सर्दियों की शुरूआत से

पंखों में जिनके उलझा रहता है

सूरज रोज सुबह उगने से पहले



आओ देखो कि कैसे चढ़ आई है जवानी

बूढ़े तालाब पर बिछड़े यारों से मिलकर

आओ देखो कि अरसा गुजर गया है 

हमें भी मिले हुए

आओ देखो कि कुछ नए दोस्त बनाएं हैं मैने

तुम्हारे जाने के बाद


-नित्यानंद 

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