तुम्हें
पता है शहर के चिल्ल पों से दूर
मैने खोजी है इक जगह
जहाँ चहचहाती हैं हजारों चिड़ियाँ एक साथ
पेड़ों और झुरमुटों की ओट में छुपकर
गाती हैं कलरव गीत
चलो आज चुपचापबैठते हैं उस पेंड़ के तले
सुनेंगे वह धुन जो है संगीत से परे
तुमने
देखी है बगुलों की कतार
लाल
और सफेद बगुलों की कतार
गोधूलि
में विषयांतर करते हुए
चलो
आज शाम बैठते हैं उस
पहाड़ी मंदिर की मुंडेर पर
अनाम
देवता के खण्डहर मंदिर से
क्षितिज
से उठकर क्षितिज में गुम होते
देखेंगे
बगुलों की कतार घंटो तक
चलो
तुम्हें मिलवाता हूँ
उन
दूर देश से आए मेहमानों से
जंगल
के उस तालाब किनारे
डाले
हैं आशियाना वे सर्दियों
की शुरूआत से
पंखों
में जिनके उलझा रहता है
सूरज
रोज सुबह उगने से पहले
आओ
देखो कि कैसे चढ़ आई है जवानी
बूढ़े
तालाब पर बिछड़े यारों से मिलकर
आओ
देखो कि अरसा गुजर गया है
हमें
भी मिले हुए
आओ
देखो कि कुछ नए दोस्त बनाएं हैं मैने
तुम्हारे
जाने के बाद
-नित्यानंद